कली

एक आँगन के गुलशन में,
उस घर के माली (मालिक) ने,
चाहत के बीज लगाए,
उस घर की फुलवारी में।

बढ़ा पौधा चाहत का,
कली हुई एक प्यारी,
महका चमन खुश था माली,
बहकी बहकी डाली।

हर लम्हा करता रखवाली,
बढ़ती कली फैली खुशहाली।
कली खिली और फूल बनी,
घर आँगन फिर छोड़ चली।

जिस गुलशन में कली खिली,
जिस माली ने सींची डाली।
उस आँगन को छोड़ चली,
महकाने दूजी फुलवारी।

बस इतनी सी है कहानी,
है वो किसी की निशानी।
पर जीना है जिंदगानी,
दुनिया की है रस्म निभानी।

नीति

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