कोहे फिजा
गगन के पीर से कह दो
धरती का प्यार आ रहा है
मुझसे मेरे दिल को
वो बदला बदला सा जा रहा है
दुल्हन कुदरत की गलियों में
जवान ऐसे फिरते न होंगे
अकेले ही मुझसे मेरी
रजा को उलझा रहा है
ऐसी बातें क्या जान मेरी
सुधार रही जज्ब को
माटी के पुतले को
कण कण में बिखरी रही है
आग के दरिया में कूदे
दीवाना ऐसा ही
बेफिक्र साथ दूंगा तेरा
जन्नत से वादियों को फुसला ऐसा रहा है
काश तुझमे करीब मेरा सबकुछ हो
सबके सब मुझमे तुझे देखते हे
यारों को देखने या
खुद दिखने मुझे सामने बुलवा रहा है।
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