धूपांजलि
है बादलों के चंगुल में
जगत की जान रे
तू सुन ले अब स्वयं ही रखना ध्यान
अपना रे किसान से।
माटी के मौर्य मुखौटे लिये
गली गली में घूम रहे अंजान रे
तोड़ मिथक दम का
साहस से कर अपना उत्थान रे।
मोल भाव में चुंगी वाले
मुट्ठी भर दानों की खोल रे
बतला क्या होगा
इन दानों की कीमत मोल रे।
चार दीवारों में सिमटी
निर्धन की गरीबी हे भगवन बड़ी व्योम रे
आज कटा दिन जैसे तैसे
कल क्या हाल में होता सोम रे।
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