उम्र दो पल की है
उम्र दो पल की हैक्या पाना क्या खोना है
जो हो चूका और जो होगा
बस उससे ऑंख मिलाना हे
करवट उलाहना जीवन को
बारी बारी करती है
सच तो यह भी है
ये डर डर के आगे बढ़ती है
एक कविता मेरी पौष
की झिलमिल सुबह पर
वह राशन रहित बच्चे
खाली पेट , बुझे उन चूल्हो पर
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