जीवन आंकलन

जब से जीवन है मिला 
सांसे कभी रूकती कभी चल पड़ती है 
इसके चल पड़ने का कोई यकीन नहीं 
एक बंधन बढ़ा आगे जिसकी कोई जमीन नहीं 
हौसलें कभी मिलते है , कभी हौसले पस्त भी होते है 
किन्तु इस बीच बिना जमीन का वह रिश्ता फलता जाता है 
सुंदरत उपवन में मानो लालिमा कोई बिखर सी जाती है 


जोश दम बल सारे अधूरे है 
जबतक ह्रदय में जज्बातों की किरणे नहीं होती 
यूही किस्मत किसी किसी की परवान नहीं चढ़ती 
आओ इस बरस एक दिप सदर पर जला दें 
टूटे  मकानों को सज्जा से मिला दें 


फिर न दिप बुझेगा कभी न शहर अँधेरे होंगे 
तू ऐ दिल जिसमे राजी वही शामिल होंगे 

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