धुली नजर

धूल गई नजर को एक कतराए इशारा चाहिए
पलकों के सावन में ख्वाबों के साथ नहाइये।

इरादें लो गजब है क्या खूब ढाते है
आँखों से यार चश्मे से बहाते है।

नीली नौगाम पहाड़ियों के दर्शन क्या खूब है
नक्शाये कुदरत जमीन पर शक्ल में हरी दूब है।

खुल गई कलाइयां मिटने लगी जुदाई की झाइयां
मंद मंद फ़िक्र की मिटती है अब बुराइयां।

दो बात क्या खूब और किसी ने कहीं है
मानों तो चिराग ही उम्मीदों का फलक है वरना , राइ है।

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