गरीब की रोटी
एक टुकड़ा जितना पूण्य दे जाता है
जन्म जन्म तक सुख की प्रार्थना कह जाता है
हाथ थरथराते जब आगे बढ़ते है
सच में ह्रदय भित्तियों से मानो लड़ते है
गमगीन निगाहें न जाने किसका प्रतिकार लेती है
कश्ती टूटी बिखरी पतवार को कहती है
माँ के उजियारे में जीवन क्या फलता फकत होता था
उलाहना का कोई मामला कभी न होता था
चरम पर नीलामी विस्तार है क्या हो रही
करोड़ों में निष्काम और मजदूरी है रो रही
इमारत जिनकी लाशों पर लारें टपकाती है
मुक्त के क्षणों में आँखे मेरी झपकाती है।
Comments
Post a Comment