नूर के कंगन

रोम रोम जिसके एक चमक में लिपटे है
वो कलाई जिसके पथ पर कालिन नूर के सिमटे है
ऐसी खुश्क मीठी उजली हथेली पर
जैसे दो जहां उमड़ने को छूटे है।

पलको के आँगन में देर सवेर किरणे पड़ी
टपका अमृत जैसे लगी झड़ी।

ओ जमाने में पैदा हुए स्वर्ग के कुमार
निस्तेज जिगर को करता देता है अभिसार

लोभ लुभावन के प्यारे पैकर
किस्मत को मेरे कर दे शहर।

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