सियासत

खाली सियासत को
परवाह न इंसान की है
झगड़े दो भाई करें
उसे मगर फ़िक्र धनो के खदान की है।

चंगी भली गृहस्थी कब
कैसे है उजड़ जाएँ
उसको तो इनकी लाशों से
अपना व्यापार हो जाएं।

साम दाम दंड के अकाली
घात में लगे बैठते है
जब क्षति मान अथवा
जान की हो तो इंसाफ देने के लिए ऐंठते है।

हमे शक इनके भी इंसान होने पर
क्या खूब होता है
मात की चीखों में भी
अंदर अंदर हर्ष इन्हें होता है।

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