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यादें

काश ऐसा दिन ना आए..... जब तू मेरी बातों से नहीं, मुझसे बात करने को परेशां हो। एक अहसास हो महसूस मेरी आवाज हो, जो गुजारिश करे कुछ पल मेरे संग रहो। तब हम ना हों बस मेरी यादें हों, एक साया मेरे ख्यालों का तेरे संग हो। हम तड़प जाएँगे कि तुम परेशां हो, ना होकर भी मेरी दुआएँ तेरे साथ हों। तू रह सके बिन हमारे हर खुशी तेरे पास हो, याद आए तो भीगी पलकें और होंठो पर मुस्कान हो। है जब तक जीवन तेरा मेरा संग और प्रेम हो, बस यही आरजू यही हृदय से फरियाद हो। नीति

आखिरी वक्त

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जो काम हो कल पर न टालो, जो रिश्ते उलझे आज सँवार लो। आत्मा ना जाने कब मिल जाए परमात्मा से, कब दूर हो जाएँ हम अपने अजीज़ से। ना कोई भरोसा कब साँस अंतिम हो, आज मिले कल ना दर्शन हो। दिनकर के संग अस्त जीवन हो, या चन्दा के संग डूब जाए जिन्गानी। जो संग हो तुम्हारे हर खुशी उनको दो, वक्त का क्या पता कब कैसा हो। आज मिले कल बिछड़ना पड़े, क्या खबर कब आखिरी वक्त आए। श्रीदेवी जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि🌹 ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दें🙏😢 नीति

नारी

किसी ने कहा है..... "यत्र नार्यश्यु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।"     वह घर हमेशा खुशहाल और सम्पन्न होता है जहाँ नारियों को सम्मान और प्रेम दिया जाता है।  नारी माँ, बहन, बेटी, पत्नी, दोस्त हर रूप में खुद को पूरी तरह समर्पित कर देती है। जरूरत है उसकी भावनाओं को समझने की सच्चा साथ निभाने की।      आज स्थिति दयनीय हो गई है।  कहने को आजाद है नारी पर सचमुच में क्या आजाद है वो ?? बिल्कुल नहीं.. बाहर गिद्ध सी नजर रखने वाले कितने ही लोगों से उसे खुद को बचाती फिरती है वो।  घर पर छोटी सी बच्ची जो कुछ समझती भी नहीं वो बुरी नीयत का शिकार हो जाती है। बढती बच्चियों पर और महिलाओं पर तो लोग आसानी से उँगली उठाते हैं कभी चरित्र, कभी संस्कार और कभी वक्त को लेकर। पर मासूम बच्चियों के साथ जो हुआ वो किसका दोष ?? घिनौनी मानसिकता से पीड़ित लोग किसी को कुछ नहीं समझते। ज़िन्दगी खेल हो गई है उनके लिए।      कभी प्रेम के नाम पर धोखा खाती है, कभी ससुराल में सताई जाती है, कभी कोई सगा ही ठग लेता है उसकी मासूमियत को।      हर वक्त, हर उम्र में ना...

झलक

सबसे करीब भी है, और बहुत दूर भी है, एक झलक पाने को मगर, दिल में तड़प भी है। झिझक भी है, ललक भी है, ना मिलने की मगर, हरपल कसक भी है। तन्हाई भी है, महफिल भी है, इन्तजार में मगर, एक बेचैनी भी है। मिलन की चाह भी है, और डर भी है, विरह का मगर, हृदय में दर्द भी है । दिल में भी है, धड़कन में भी है, ख्वाबों में नहीं मगर, रूह में भी है। ख्यालों में भी है, अहसासों में भी है, झलक नहीं मिलती मगर, नज़र में भी है। नीति

रक्त रंजिर धरा

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रक्त रंजित धरा, देख हृदय है डरा। छिन्न-भिन्न हुई मानवता, रो रही हैं भारत माता। दया हृदय से मिटी, बच्ची पर भी आँख उठी। तोड़ सब अब खामोशी, खत्म कर दो बेबसी। खेल मत रक्त की होली, कर न माँ को अपनी मैली। पकड़कर मानवता का हाथ, चलना है हमें साथ-साथ। मिटाना है अत्याचार, दूर करना है अँधकार। नीति

जीवन

अकेले आए हैं और अकेले ही जाना है। रस्ते में कितने अजीज़ मिलते हैं बिछड़ जाते हैं। याद करके उनको हम रोते हैं तड़पते भी हैं। फिर अनजान राह पर निकल पड़ते हैं। गिरते हैं संभलते हैं कितनी चोट खाते हैं। फिर हिम्मत करते हैं और आगे बढ़ते जाते हैं। याद कभी माँ का आँचल आता है। कभी पिता दुलारते और फटकारते हैं। यादों का कारवाँ लेकर हम आगे बढ़ते जाते हैं। आए थे अकेले एक रोज निकल जाना है। जीवन की हर उलझन अकेले ही सुलझाना है। तैरकर भवसागर के पार निकल जाना है। नीति

तन्हाई

तेरा इंतजार करते हुए ऐसा लगता है... जैसे कहीं वीरान रस्ते पर हम बैठे हैं। दूर-दूर तक बस अकेलापन है तन्हाई है, और तुझसे दूरी का अहसास है। नीति