नारी
किसी ने कहा है.....
"यत्र नार्यश्यु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।"
वह घर हमेशा खुशहाल और सम्पन्न होता है जहाँ नारियों को सम्मान और प्रेम दिया जाता है। नारी माँ, बहन, बेटी, पत्नी, दोस्त हर रूप में खुद को पूरी तरह समर्पित कर देती है। जरूरत है उसकी भावनाओं को समझने की सच्चा साथ निभाने की।
आज स्थिति दयनीय हो गई है। कहने को आजाद है नारी पर सचमुच में क्या आजाद है वो ?? बिल्कुल नहीं.. बाहर गिद्ध सी नजर रखने वाले कितने ही लोगों से उसे खुद को बचाती फिरती है वो। घर पर छोटी सी बच्ची जो कुछ समझती भी नहीं वो बुरी नीयत का शिकार हो जाती है। बढती बच्चियों पर और महिलाओं पर तो लोग आसानी से उँगली उठाते हैं कभी चरित्र, कभी संस्कार और कभी वक्त को लेकर। पर मासूम बच्चियों के साथ जो हुआ वो किसका दोष ?? घिनौनी मानसिकता से पीड़ित लोग किसी को कुछ नहीं समझते। ज़िन्दगी खेल हो गई है उनके लिए।
कभी प्रेम के नाम पर धोखा खाती है, कभी ससुराल में सताई जाती है, कभी कोई सगा ही ठग लेता है उसकी मासूमियत को।
हर वक्त, हर उम्र में नारी को संभलकर रहना पड़ता है। जाने कब किस बात पर उसके चरित्र पर उँगली उठा दी जाए। जाने कौन सा कदम उसके लिए भारी पड़ जाए। हर वक्त एक अनजान डर में जीती है नारी।
आखिर कब तक ऐसा होता रहेगा?? आजाद भारत में नारी बस नाम के लिए ही आजाद कब तक रहेगी?? कब वो निडर होकर रह पाएगी ?? कब ????
नीति
"यत्र नार्यश्यु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।"
वह घर हमेशा खुशहाल और सम्पन्न होता है जहाँ नारियों को सम्मान और प्रेम दिया जाता है। नारी माँ, बहन, बेटी, पत्नी, दोस्त हर रूप में खुद को पूरी तरह समर्पित कर देती है। जरूरत है उसकी भावनाओं को समझने की सच्चा साथ निभाने की।
आज स्थिति दयनीय हो गई है। कहने को आजाद है नारी पर सचमुच में क्या आजाद है वो ?? बिल्कुल नहीं.. बाहर गिद्ध सी नजर रखने वाले कितने ही लोगों से उसे खुद को बचाती फिरती है वो। घर पर छोटी सी बच्ची जो कुछ समझती भी नहीं वो बुरी नीयत का शिकार हो जाती है। बढती बच्चियों पर और महिलाओं पर तो लोग आसानी से उँगली उठाते हैं कभी चरित्र, कभी संस्कार और कभी वक्त को लेकर। पर मासूम बच्चियों के साथ जो हुआ वो किसका दोष ?? घिनौनी मानसिकता से पीड़ित लोग किसी को कुछ नहीं समझते। ज़िन्दगी खेल हो गई है उनके लिए।
कभी प्रेम के नाम पर धोखा खाती है, कभी ससुराल में सताई जाती है, कभी कोई सगा ही ठग लेता है उसकी मासूमियत को।
हर वक्त, हर उम्र में नारी को संभलकर रहना पड़ता है। जाने कब किस बात पर उसके चरित्र पर उँगली उठा दी जाए। जाने कौन सा कदम उसके लिए भारी पड़ जाए। हर वक्त एक अनजान डर में जीती है नारी।
आखिर कब तक ऐसा होता रहेगा?? आजाद भारत में नारी बस नाम के लिए ही आजाद कब तक रहेगी?? कब वो निडर होकर रह पाएगी ?? कब ????
नीति
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