वक़्त

वक़्त की क्या खूब कहानी है,
कभी कटता नहीं कभी रुकता नहीं है।
घड़ी मिलन की कुछ पल में चली जाती है,
जुदाई का लम्हा खत्म नहीं होता है।

वक़्त की दहलीज में वो हमें बाँधते हैं,
वो नहीं समझते चाहत की कोई हद नहीं है।
हम उन्हें बेपरवाह, बेइंतहा, बेहद चाहते हैं,
फिर साथ रहने की वो हद में क्यों बाँधते हैं?

आज संग रहने का वक़्त नहीं है,
कल होगा वक़्त तो क्या पता कौन कहाँ है?
मिले जो ख़ुशियाँ जी भरकर जीना है,
क्यों वक़्त के नाम रोना है??

वक़्त हो न हो तू हर लम्हा मुझमें बसता है,
तेरे ही नाम से ये दिल मेरा धड़कता है।
जब भी तू हमें पुकारता है,
सब भूल हम तेरे ही संग संग होते हैं।

नीति

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