इंतजार
दिनकर ने छिपकर की धरा संग आँख मिचौली,
ऋतु है मस्तानी बदरा में पंक्षियों की रैली।
बिखरी है कुसुम सुगन्ध भ्रमर करता अठखेली,
तरु झूमे शीतल समीर से लता खुश होकर झूली।
पतझड़ की ऋतु आई बिखरी रज धूली,
तेरे इंतजार में मेरी अँखियाँ हैं खुली।
आ जाओ जाने कितनी ऋतुएं हैं बदली,
नैना हैं तरसे तुम बिन सबकुछ मैं भूली।
होकर मैं बावरी फिरती तेरी गली,
आ जाओ सनम तेरी बगिया की मैं कली।
तू ही है जीवन तेरे संग संग मैं चली,
कह दो तुम आज तेरे लिए मैं बावली।
नीति
बहुत ही सुन्दर
ReplyDeleteधन्यवाद
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