कश्मकश

घिरी हुई हूँ खामोशी के बादलों में,
ना जाने किसके इंतजार में।
हताशा की गहरी खाई में,
डूबी हूँ तन्हाई के समन्दर में।

विचारों की उथल-पुथल में,
भटकती हूँ सुनसान जंगलों में।
लगता है अकेली हूँ वीरान खण्हर में,
ना जाने हूँ किसके इंतजार में।

चिंतित हूँ क्यों आई इस जीवन में,
चली जा रही हूँ बेमक्सद अंजान राहों में।
क्या सोच ईश्वर ने भेजा इस जहाँ में,
क्या किया अब तक ज़िन्दगी में।

क्या करूँ ऐसा कुछ कर पाऊँ दुनिया में,
डूबी हुई हूँ अन्जान ख्यालों में।
कहाँ जाना है जाने हूँ मैं किस इंतजार में,
कैसे सुलझाऊँ उलझन, हूँ मैं कश्मकश में।

नीति




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