इंसानियत

काफिले की सख्ती से राह में रोड़े है
मंजिलें दूर पथिक को गुमनामी ने मोडे है।

सुबह सब्जगाही के निराले गुल थे
किसी की बुरी नजर में कांटे बबूल थे।

कौन नद किनारे बैठ गीत ख़ुशी के गायेगा
सेहरा की तेज धुप की चीख धरती को सुनाएगा।

कितने साथी इस जतन मन के लिए सो गए
सिपाही हक के बातिल के हाथों जान धों गए।

लरज है घुटन है शहरों के विवश स्वर सुनकर
गरीबों की हाय से कोई बचा नही जालिम रूककर।

ढेरों तमन्नाएँ घाव गहरे सीने पर किये है
पर कितनों ने आगे जिगर से बीज दया के बोये है।

हलकान मुझे समर से तब ही होगी
इंसानियत का जिता जागता एक एक होगा जोगी।

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