बीतीं जिंदगी की बातें
बीत रही बरसात की बीत रही बातें
झलकती मदहोश हो रही अंधी रातें।
किले दरक रहे दरवाजें कूढ़ते टीले
राह सामने लेकिन फिर भी बिखरे काफिले।
घड़ी नाजुक दिन कमजोर साल उंघते
काल ने पकड़ी चाल कहर आ गया मगर सूंघते।
दर्द और दरिया का कोई मेल नही महिमा,
लेकिन अकेला शरीर इनका भी अब सहमा।
हवा कुछ अब चलकर थकने लगी
ठण्डी होकर छेड़ता कोई तो आंधी का रूप लेती कहीं।
आसमान इतराते नही बस बरस जाते
वो बात अब नही क्या ख्वाब उसे नही आते?
ऐठन में हर कोई इंसान शे है
फ़िक्र न दुनिया की न पहचानता कोई किसे है।
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