जीतनी जंग है

कठोर समय के मध्य झूलते हुए
संघर्ष के अनमोल क्षणों को रूलते हुए
स्वयं को आगे बढ़ाना लक्षयंक है
जीतनी जंग है।


बेहिसाब रूकावट मन को भींचने लगेगी
टूटती सांसे कण्ठ रेतने भी लगेगी
करों में लग जायेंगे तालें रंक है
किन्तु जीतनी फिर भी जंग है।


कम और ज्यादा का गणित
छोड़ पकड़ने को न बचा अब मीत
थोड़े में विराट से जग को करना दंग है
जीतनी जंग है।


बाजुओं को फैलाकर आजादी बताना है
जख्म खाकर भी खड़े हो जाना है
मिटटी से अंकुर का सपना न अब विलम्ब है
जीतनी जंग है।


कला की अभिव्यक्ति सजना सजाना है
भूलकर भी स्मरण का खत रचाना है
मुठ्ठी में जिंदगी को नही बांधना अचम्भ है
जीतनी जंग है।


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