जीवन

अकेले आए हैं और अकेले ही जाना है।

रस्ते में कितने अजीज़ मिलते हैं बिछड़ जाते हैं।

याद करके उनको हम रोते हैं तड़पते भी हैं।

फिर अनजान राह पर निकल पड़ते हैं।

गिरते हैं संभलते हैं कितनी चोट खाते हैं।

फिर हिम्मत करते हैं और आगे बढ़ते जाते हैं।

याद कभी माँ का आँचल आता है।

कभी पिता दुलारते और फटकारते हैं।

यादों का कारवाँ लेकर हम आगे बढ़ते जाते हैं।

आए थे अकेले एक रोज निकल जाना है।

जीवन की हर उलझन अकेले ही सुलझाना है।

तैरकर भवसागर के पार निकल जाना है।

नीति


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