गौरांग

किरणों सा जगमग
तेज तीव्र क्या तन है
वज्र की चमक सा
ओज का पैरहन है।

क्रोध को निश्चल निष्क्रिय
काम को सतेज स्थिर
कुठारघात शिथिल हो
ऐसी गनगमयी धारा धरा जगत

ओ सौंदर्य के बागान
मुझे शक्ति से अपनी सियार कर दे

डगर की लम्बी लम्बी दूरी
डर खाये भय खाये
तेरे पद पड़ते ही पैकर
लरजते बल खाते स्वागत को उठ जाये

ऐ मंद मंद नवनीत सी त्वचा
मुझमें कुदरत के रंग भर दे।

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